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क्या हम हमारे बच्चों को ऐसी धरती देना चाहते हैं जहां सांस लेना भी दुश्वार हो ?



पर्यावरण दिवस पर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एन्वायर्नमेंटल साइंटिस्ट रामेश्वर सावने इंदौर आए। सनावदिया में चल रहे पर्यावरण संवाद के आखिरी दिन उन्होंने शहर के पर्यावरण मित्रों और पर्यावरण को बचाने आगे आए युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा : प्लास्टिक का इस्तेमाल कर अपनी धरती के साथ तो घोर अन्याय कर ही रहे हैं, साथ ही आने वाली पीढ़ियों को ऐसे वातावरण में रहने को विवश कर रहे हैं, जहां सांस लेना भी आने वाले कुछ सालों में दूभर हो जाएगा। वैसे तो कई तरह के प्रदूषण इसके लिए ज़िम्मेदार है, लेकिन सबसे बड़ा खतरा बना हुआ प्लास्टिक पॉल्यूशन। हमने पृथ्वी को इस घातक पदार्थ से पाट दिया है। प्लास्टिक टूटकर माइक्रो प्लास्टिक पार्टिकल में बदल जाता है। यह प्लास्टिक पार्टिकल पानी और जल में मिलकर पर्यावरण के असंतुलन का बड़ा कारण बनते हैं, जिसका असर क्लाइमेट चेंज के रूप में देखा जा सकता है। बायोडीग्रेडेबल प्लास्टिक भी कम घातक नहीं है। हर दिन ऐसा लाखों टन प्लास्टिक समंदरों में डाला जा रहा है। जलीय जीव मर रहे हैं। आज तो पृथ्वी हमारा ऐसा बर्ताव सहन कर रही है। लेकिन यह इसी तरह जारी रहा तो मनुष्य जाति को भयानक मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। अपने जीवन



से प्लास्टिक को बेदखल कीजिए और ज़िंदगी को हां कहिए। आईटी एक्सपर्ट समीर शर्मा ने संवाद में कहा भारत में ई-वेस्ट बड़ा और चिंता का विषय है। भारत उन 5 देशों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा ई-वेस्ट होता है, लेकिन सिर्फ उसका 5 प्रतिशत ही हम रीसायकल कर पाते है। मध्यप्रदेश में महज 3 ई-वेस्ट रीसायकल सेंटर हैं, जबकि 150 सेंटर की आवश्यकता है। धरती को भी इसी तरह प्लास्टिक से पाट दिया है हमने प्लास्टिक प्रदूषण धरती और प्राणियों के लिए कितना हानिकारक है, यह बताने के लिए ईशा फाउंडेशन के सदस्यों ने अपने चेहरों को प्लास्टिक बैग्स से ढंक कर नो टु प्लास्टिक का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि प्लास्टिक पॉल्यूशन प्रकृति का दम घोट रहा है। इस अवेयरनेस प्रोग्राम के तहत राजबाड़ा, रीगल तिराहा, 56 दुकान पर कई कार्यक्रम हुए। इन क्षेत्रों में प्लास्टिक इकट्ठा कर बिजूका बनाया गया। ओल्ड डेलियन देवराज बडगारा, कुलदीप सिंह राणा, अखिलेश शाह और डॉ. पूनम राणा भी इस सार्थक पहल का हिस्सा बने। चिड़ियाघर की दीवारों पर युवाओं ने विलुप्त होती प्रजातियों की पेंटिंग्स बनाईं। एनिमल रीहैबिलिटेशन एंड प्रोटेक्शन फ्रंट (एआरपीएफ) और ज़ू वॉलंटियर्स ने कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय के मुख्य द्वार और दीवारों पर सूखते दरख्त, दरकती ज़मीन और खत्म होती वन्य संपदा को चित्रों से बयां किया। शेर के पंजे, रेंडियर और जिराफ की आकृतियां बनाकर उन पर संदेश भी लिखे।





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