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फिजिकली ही नहीं मेंटली भी डिस्टर्ब करता है सफ़ेद दाग का मर्ज, नहीं है लाइलाज, जानें इससे जुड़े भ्रम और सच



हेल्थ डेस्क.कई मामलों में बीमारी से ज़्यादा उसकी वजह से हुआ तनाव मरीज़ को कमज़ोर कर देता है और उनमें से एक है सफेद दाग। इसे विटिलिगो भी कहा जाता है। सफेद दाग़ एक पिग्मेंटेशन डिसऑर्डर है जिसमें मेलेनोसाइट कोशिकाएं जो पिग्मेंट्स का निर्माण करती हैं, वह नष्ट हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप त्वचा पर सफ़ेद रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं। यह सफ़ेद चकत्ते शरीर की बाकी त्वचा से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। यह रोग म्यूकस मेम्ब्रेन जैसे कि नाक और मुंह के अंदर के ऊतक और आंखों को भी प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में त्वचा रोग विशेषज्ञ और विटिलिगो विशेषज्ञ से इलाज कराएं। डॉ. रोहित बत्रा, त्वचा विशेषज्ञ और विटिलिगो एक्सपर्ट, सर गंगा राम अस्पताल नई दिल्ली और डॉ. शिवानी अटरेटा साइकोलॉजिस्ट, अटलांटा हॉस्पिटल, गाजियाबाद से जानते हैं इसके बारे में...रोग के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पूरे विश्वभर में इस रोग को लेकर जागरूकता की कमी है। सफेद दाग की बीमारी को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां प्रचलित हैं इसके कारण इस रोग से पीड़ित व्यक्ति पर कई नकारात्मक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ते हैं।आत्मविश्वास में कमी :कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि सफ़ेद दाग़ से पीड़ित कुछ लोगों में



आत्मविश्वास को लेकर भी बड़े बदलाव देखे गए हैं। यही नहीं स्टूडेंट्स के शैक्षणिक प्रदर्शन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।गलत सोच कि यह है ईश्वर का दंड :सफेद दाग उन रोगों में से है जिसका सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव रोगी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव से अधिक गहरा और गंभीर होता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इस रोग से कई भ्रांतियां जुड़ी हुई हैं जो वास्तविकता से परे हैं जैसे कि यह सोचना कि गलत कार्यों की वजह से भगवान सफ़ेद दाग़ के रूप में सजा देते हैं। यह पूरी तरह निराधार है। इनको दरकिनार करके, सफ़ेद दाग़ का उपचार अवश्य कराएं।लोगों से मिलना कम कर देना :सफ़ेद दाग़ को अपने शरीर पर देख कर मरीज़ का आत्मविश्वास कम हो जाता है जिसके कारण वो लोगों से मिलना काम कर देता है। कई बार सार्वजनिक समारोह में आना-जाना बंद कर देता है और अकेले रहने लगता है, जिससे अवसादग्रस्त हो जाता है।तनाव और अवसाद दूर करें :अगर परिवार में किसी को सफ़ेद दाग़ की बीमारी हो जाती है तो पूरा परिवार परेशान हो जाता है। अगर परिवार में कोई सफ़ेद दाग़ की बीमारी के कारण दुःखी और उदास रहने लगा है तो किसी मनोचिकित्सक को दिखाएं। एंटी डिप्रेसेंट दवाइयों के साथ साइको थैरेपी भी दिलाएं। सफ़ेद दाग़ के कारण अगर अवसाद के शिकार हो गए हों तो उससे निपटने के लिए निम्न उपाय करें।सकारात्मक सोच जरूरीखुदके प्रति एक सकारात्मक सोच पैदा करें क्योंकि इससे शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।खुद को स्वीकार करें, स्थिति से सामंजस्य बिठाइए।लोगों से अलग-थलग न रहें। सामाजिक बनें। अपनी सोशल लाइफ़ को बनाए रखिए।नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करें।गैजेट्स के साथ कम से कम समय बिताएं।7-8 घंटे की पर्याप्त नींद लें।ऐसे लोगों की बातें न सुनें जिन्हें विटिलिगो के बारे में सही जानकारी नहीं है।इस बीमारी का अनुवांशिकता से सीधे कोई संबंध नहीं है, सिर्फ 20 फीसदी लोगों को सफ़ेद दाग़ की समस्या अनुवांशिक तौर पर होती है।इलाज है मौजूद स्टेरॉयड, अल्ट्रावॉयलेट एए, इम्युनोमोडायलर ड्रग्स और नए संकीर्ण बैंड अल्ट्रावॉयलेट बी जैसी दवाएं सुलभ हैं। इसके अलावा कई सर्जिकल विकल्प जैसे पंच ग्रेफ्टिंग फायदा पहुंचाती है। नवीनतम तकनीक मेलेनॉइट ट्रांसमिशन है, जिसमें सामान्य त्वचा से केवल मेलानोसाइट्स निकाला जाता है और विटिलिगींयस स्पॉट्स पर इंजेक्ट किया जाता है।विटिलिगो से जुड़े भ्रम और तथ्य1.मिथ : विटिलिगो विकार वाले लोगों में किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक कमी होती है या हो जाती है। सच :विटिलिगो पूरी तरह से त्वचा तक सीमित है। इसका किसी अन्य अंग या मानसिक स्थिति पर स्वत: कोई प्रभाव नहीं पड़ता।2.मिथ : विटिलिगो एक प्रकार का कुष्ठ रोग है और संचारी है। सच : विटिलिगो कुष्ठ रोग से जुड़ा नहीं है। यह संक्रामक नहीं है और इसलिए छूने, रक्त, सांस लेने, लार, चीजें जैसे तौलिए आदि साझा करने या पीने के पानी के लिए एक गिलास का उपयोग करने जैसे ज़रियों से एक व्यक्ति से दूसरे तक नहीं जा सकता है।3.मिथ : गलत खाद्य पदार्थां के मिश्रण जैसे मछली के खाने के तुरंत बाद दूध पीने आदि की वजह से विटिलिगो होता है। सच :इस रोग का आहार के साथ कोई संबंध नहीं है। इसी प्रकार रोगियों को इस विश्वास से कि दाग़ कम हो जाएंगे खट्टे पदार्थों जैसे दही, नींबू, अचार और टमाटर खाने से रोकना अनुचित है।4.मिथ :विटिलिगो गंभीर त्वचा रोगों से जुड़ा हुआ है जैसे कि त्वचा कैंसर और जैविकता। सच : इनमें से प्रत्येक सिंड्रोम में पारदर्शी असमानताएं हैं, उनमें से कोई भी विटिलिगो से नहीं जुड़ा है। कुछ लोग अपनी त्वचा में मामूली या कम मेलानिन के साथ पैदा होते हैं। विटिलिगो की शुरुआत तब होती है जब मेलेनोसाइट्स घायल हो जाते हैं।फैक्ट एंड फिगर्सविश्व की जनसंख्या का 0.5.1 प्रतिशत इससे पीड़ित है। आंकड़ों की मानें तो भारत में इसके रोगी सबसे अधिक हैं।इस बीमारी का असर हर व्यक्ति पर एक सा नहीं होता है। उपचार न कराने पर कुछ लोगों में यह तेज़ी से फैलता है तो कुछ पर सालों तक कोई विशेष असर नहीं होता है।





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